Uttarakhand Glacier Burst 2025 : ग्लेशियरों के टूटने से निचले क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा, भू-वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी
(Tehelka Desk)Uttarakhand Glacier Burst 2025 :
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियरों का टूटना एक गंभीर खतरे का संकेत बनता जा रहा है। भू-वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियरों की गति तेज हो रही है और उनके टूटने से निचले क्षेत्रों में अचानक बाढ़ (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड – GLOF) का खतरा और अधिक बढ़ गया है। इस चेतावनी ने उत्तराखंड सरकार, आपदा प्रबंधन एजेंसियों और आम जनता को सतर्क कर दिया है।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : जलवायु परिवर्तन
विशेषज्ञों का कहना है कि उत्तराखंड में तेजी से बदलता मौसम, ग्लोबल वार्मिंग और बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव ग्लेशियरों पर सीधा असर डाल रहा है। जिन स्थानों पर पहले सालभर बर्फ जमी रहती थी, अब वहां बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। इससे ग्लेशियरों के नीचे बड़ी झीलें बनने लगी हैं। जैसे ही इन झीलों का दबाव बढ़ता है, उनका बांध टूट जाता है और निचले इलाकों में अचानक बाढ़ आ जाती है।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : 2021 की त्रासदी
याद दिला दें कि फरवरी 2021 में चमोली जिले के रेणी गांव के पास ग्लेशियर टूटने से बड़ी आपदा आई थी। अलकनंदा और धौली गंगा नदियों में अचानक जलस्तर बढ़ गया, जिससे कई लोगों की मौत हो गई और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स को भारी नुकसान पहुंचा। भू-वैज्ञानिकों का कहना है कि उस घटना से सबक लेते हुए अब भी सतर्कता बरतनी होगी।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : इलाकों पर खतरा
भू-वैज्ञानिकों की ताज़ा चेतावनी के मुताबिक, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग और बागेश्वर जिले सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्र हैं। यहां बड़ी संख्या में गांव नदियों के किनारे बसे हुए हैं। जैसे ही ग्लेशियर टूटकर झीलें खाली होती हैं, निचले इलाकों में रहने वाले हजारों परिवार खतरे में आ जाते हैं।
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Uttarakhand Glacier Burst 2025 : निगरानी की जरूरत
विशेषज्ञों ने जोर दिया है कि उत्तराखंड में हर ग्लेशियर और उनसे बनने वाली झीलों की वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। रडार सिस्टम, सैटेलाइट इमेजिंग और सेंसर आधारित अलर्ट सिस्टम से ही समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : परियोजनाओं पर सवाल
ग्लेशियरों के टूटने और जलवायु परिवर्तन के खतरे के बीच राज्य में हो रहे बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यों पर भी सवाल उठ रहे हैं। सड़कों, सुरंगों और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए की जा रही कटाई से पहाड़ अस्थिर हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विकास और पर्यावरण में संतुलन नहीं रखा गया तो आपदा का खतरा और बढ़ सकता है।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : लोगों की चिंता
पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोग पहले से ही हर साल भूस्खलन और बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं। अब ग्लेशियर टूटने का खतरा उनकी चिंता और बढ़ा रहा है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि सरकार को ऐसे गांवों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की योजना बनानी चाहिए जो लगातार जोखिम वाले क्षेत्रों में बसे हैं।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : आपदा प्रबंधन की तैयारी
राज्य आपदा प्रबंधन विभाग (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) लगातार मॉक ड्रिल और जागरूकता अभियान चला रहे हैं। गांवों में चेतावनी तंत्र स्थापित किए जा रहे हैं और स्थानीय युवाओं को प्रशिक्षित किया जा रहा है ताकि आपदा की स्थिति में तुरंत बचाव कार्य शुरू किया जा सके।
Uttarakhand Glacier Burst 2025 : विशेषज्ञों की राय
भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तराखंड में ग्लेशियर टूटने की घटनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्च, समय पर चेतावनी, पर्यावरणीय संतुलन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद अहम है।
उत्तराखंड का भविष्य उसके पहाड़ों और ग्लेशियरों से जुड़ा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो ग्लेशियर टूटने से आने वाली बाढ़ें बड़ी आपदा का रूप ले सकती हैं। सरकार, वैज्ञानिक संस्थान और आम जनता को मिलकर इस खतरे से निपटना होगा।


