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Uttarakhand Education Policy 2025:  उत्तराखंड में पहली कक्षा में दाखिले की उम्र में बदलाव, सीएम धामी का बड़ा फैसला

Tehelka Desk(Muskan Kanojia) Uttarakhand Education Policy 2025:

Uttarakhand Education Policy 2025  (NEP) 2020 के तहत, भारत सरकार ने पहली कक्षा में प्रवेश के लिए न्यूनतम आयु 6 साल निर्धारित की थी। इससे पहले, कई राज्यों में यह आयु सीमा 5साल थी। उत्तराखंड में भी इस नीति को लागू किया गया था, जिसके कारण कई बच्चों के लिए पहली कक्षा में प्रवेश पाना मुश्किल हो गया था।

Uttarakhand Education Policy 2025:   मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का निर्णय

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस समस्या का समाधान करते हुए 6 साल से कम आयु के बच्चों को पहली कक्षा में प्रवेश देने की अनुमति प्रदान की। उन्होंने शिक्षा विभाग के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिससे नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी कक्षाओं में कम आयु में उत्तीर्ण छात्रों को पहली कक्षा में प्रवेश मिल सकेगा।

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Uttarakhand Education Policy 2025:   चुनाव आचार संहिता और प्रशासनिक प्रक्रिया

चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण इस निर्णय को लागू करने के लिए निर्वाचन विभाग से अनुमति ली जा रही है। हालांकि, मुख्यमंत्री कार्यालय से प्रस्ताव शिक्षा विभाग को मिल चुका है, और जैसे ही अनुमति मिलती है, यह निर्णय प्रभावी हो जाएगा।

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Uttarakhand Education Policy 2025:   अभिभावकों और स्कूलों के लिए राहत

इस निर्णय से उन अभिभावकों को बड़ी राहत मिली है, जिनके बच्चे कम आयु में नर्सरी, एलकेजी या यूकेजी कक्षाएं उत्तीर्ण कर चुके हैं, लेकिन आयु सीमा के कारण पहली कक्षा में प्रवेश नहीं पा रहे थे। अब वे बिना किसी बाधा के अपने बच्चों को पहली कक्षा में दाखिला दिलवा सकते हैं। इसके अलावा, स्कूलों को भी अब आयु सीमा के कारण छात्रों के प्रवेश में कोई समस्या नहीं होगी।

Uttarakhand Education Policy 2025:   शिक्षक संघ की आपत्ति

हालांकि, राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ ने इस निर्णय पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह छूट केवल निजी स्कूलों को लाभ पहुंचा रही है, जबकि सरकारी स्कूलों में नर्सरी, एलकेजी और यूकेजी कक्षाएं संचालित नहीं होती हैं। इसलिए, सरकारी स्कूलों के छात्रों को इस छूट का लाभ नहीं मिल रहा है, जिससे उनमें असंतोष है।

Uttarakhand Education Policy 2025:   उत्तराखंड सरकार का यह निर्णय बच्चों के शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, सरकारी और निजी स्कूलों के बीच भेदभाव की समस्या को दूर करने के लिए और प्रयासों की आवश्यकता है। यह निर्णय अभिभावकों और स्कूलों के लिए राहत प्रदान करता है, लेकिन शिक्षक संघ की आपत्ति को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

pramesh manori

Asst. News Producer (T)

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